होटलों में श्रम कानून का हो रहा है उल्लंघन नाबालिगों से करवाया जाता हैं कार्य ।
By:- श्रवण शर्मा (कोढ़ा)
राजमार्ग 31 से सटे कोढ़ा प्रखंड के होटल ढाबा गैरेज में कर रहे हैं बाल मजदूर काम । बाल श्रम कानून का नहीं हो रहा है पालन । प्रखंड गेड़ाबाड़ी बाजार ,खेरिया बाजार, कौलासी बाजार, में चाय-नाश्ते की दुकान से लेकर होटल फुटपाथ के लिट्टी-मीट दुकान मोटर गैरेज पर भी बच्चे देर रात तक काम करते हैं । सभी दुकानों व होटलों में बाल मजदूर खुले रूप से काम करते हैं। नियमों की उड़ रही धज्जियां. कोढ़ा के विभिन्न प्रतिष्ठानों में 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चों से काम लिया जा रहा है । होटलों बच्चों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि काम नहीं करेंगे तो कहां से खाएंगे। हालांकि कुछ बच्चों ने कहा कि उनकी लिखने-पढ़ने की इच्छा है, परन्तु मालिक काम पर से छुट्टी नहीं देता है। कुछ बाल मजदूरों ने बताया कि कई माह काम करने के बाद मालिक थोड़ा-बहुत पैसा घर पर भेज देता है। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि उसे काम करने के एवज में कितना पैसा मिलता है। जिले में बाल मजदूरी को रोकने के लिए कई विभाग और गैर सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। परन्तु होटल संचालक के बच्चों से खुलेआम मजदूरी कराना सरकारी दावों की हकीकत बयां करती है। जबकि मुख्यालय में पदस्थापित वरीय अधिकारियों का आना-जाना अक्सर होता रहता है। वजह साफ है कि नियमित अभियान नहीं चलाए जाने के कारण होटल संचालकों को कानून का भय नहीं हैं। कई होटल में काम करने वाले बच्चों ने बताया कि मालिक का रवैया और व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं होता है। जरा-जरा सी बात पर मार-पीट, गाली-गलौज तो उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। शुरूआत में प्रताड़ित होने पर अजीब लगता था, गुस्सा आता था परन्तु अब तो इन सब चीजों की आदत सी हो गई है। कई बार तो मारपीट के कारण खून भी बहता है। लेकिन सब भूल कर फिर काम पर लग जाना होता है। होटल में काम करनेवाले एक बच्चे ने बताया कि लगातार काम करने की वजह से वे लोग बीमार भी हो जाते हैं। लेकिन मालिक दवा दुकान से एक-दो टैबलेट मंगा देता है। अगर रोग ठीक हुआ तो कोई बात नहीं, और अगर ठीक नहीं हुआ तो वैसी ही स्थिति में काम करना पड़ता है। तबीयत अधिक खराब होने पर भी उन्हें डाक्टर के पास नहीं ले जाया जाता है। अगर मर्ज ज्यादा बढ़ गया तो उन्हें घर जाने को कहते हैं। प्रखंड के होटलों, चाय दुकान, कारखानों समेत कई अन्य स्थानों पर बच्चों से शारीरिक परिश्रम कराया जाता है। जबकि सुबह से रात तक काम करने वाले इन बच्चों को आराम करने का समय तक नहींं मिलता है। ऐसे में लगातार बर्तन धोने जैसे काम पानी और कास्टिक जैसे केमिकल से कराए जाते हैं। जिससे इन बच्चों के हाथ-पैर चर्म रोग और कई अन्य प्रकार के संक्रमण की चपेट में जाते हैं। गुलामी प्रथा समाज का एक कोढ़ है, इससे बचाव के लिए कई कड़े कानून बने हैं। सरकार ने करोड़ों रुपए प्रति माह खर्च किए जाने के बाद भी विभागीय लापरवाही और जिम्मेवारों की अनदेखी का खामियाजा भुगतने के लिए नौनिहाल और नाबालिग भी विवश हैं। कोढ़ा में कई सड़क, होटल, दुकान में नौनिहालों और कम उम्र के बच्चों से गुलामों की तरह काम लिया जा रहा है। लेकिन जिम्मेवार अधिकारी सब कुछ जान कर भी अनजान बने रहते हैं।
