परंपरागत तरीके से मनाई गयी श्री शीतलाष्टमी पर्व,लगाया मीठा व ठंडे भोजन का भोग
अष्टमी के दिनभर भक्तजन अपने घर पर करते है ठंडा बासी भोजन ।
प्रवीण कुमार(कटिहार)
शहर के बड़ा बाजार स्थित माता शीतला के मंदिर मे श्री शीतलाष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया।इस अवसर पर मंदिर को बड़े ही आकर्षक ढंग से सजाया गया। शीतला मंदिर मे भक्तों ने प्रातः मे पूजा अर्चना की। भक्तों ने पहले अपने घर पर एक दिन पूर्व ही भोजन (प्रसाद) बनाकर दूसरे दिन प्रातः मंदिर आकर माता शीतला जी को ठंडे भोजन (प्रसाद) का भोग लगाया व शीतल जल चढ़ाया। माता को भोग मे मीठी पकोड़ी, फीकी पकोड़ी,मीठा भात,दही,राबड़ी एवं बाजरा का भोग लगाया जाता है। होली के आठवें दिन शीतलाष्टमी का पर्व बासोड़ा मनाया जाता है। इस पर्व का काफी महत्व है। माँ शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि को होती है। जिसमे पूरे विधिविधान से सप्तमी को ही श्रद्धालु अपने घर पर भोग बनाते है एवं अष्टमी को ही श्रद्धालु इसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते है। अष्टमी के दिनभर भक्त अपने घर पर ठंडा बासी भोजन करते है। माँ शीतला को शीतल जल चढ़ा कर श्रद्धालु उस जल को अपने अंग,आंखों मे लगाकर एवं अपने घरों मे जल का छिड़काव करते है एवं माता का आशीर्वाद मांगते है। ताकि सकरात्मक ऊर्जा घर मे प्रवेश कर सके। श्री शीतला माता को अत्यंत शीतल माना जाता है। कहा जाता है ये कष्ट रोग हरने वाली माता है। इनकी सवारी गधा है। पौरणिक मान्यता है कि शीतला माता चतुर्भुजी है। इनके हाथ मे कलश, सुप, नीम के पत्ते और झाड़ू होती है। ऐसी मान्यता है कि झाड़ू से दरिद्रता दूर होती है और कलश से धन कुबेर का वास होता है। इनकी अराधना विशेष कर गर्मी के मौसम मे की जाती है। स्कंद पुराण मे माता शीतला का वर्णन मिलता है जिसमें उन्हें चेचक, खसरा और हैज़ा जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाने वाली माता बताया गया है। माता शीतला अग्नि तत्व की विरोधी है। यही कारण है कि इस दिन घरों मे चूल्हा नही जलता है, कोई भी शीतलाष्टमी के दिन गरम कुछ भी नही खाते है और भोजन को एक दिन पहले ही तैयार किया जाता है। शीतलाष्टमी का पर्व एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें बासी भोजन चढ़ाया और खाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि शीतलाष्टमी के दिन से ही मौसम तेजी से गर्म होने लगता है। शीतला माता जी के स्वरूप को शीतलता प्रदान करने वाला कहा गया है।कंचन काया और आरोग्य की देवी है भगवती मां शीतला।मां भगवती कितने ही रूपों में सम्पूर्ण भारत वर्ष में आदिकाल से पूजित है। इनमें एक माता शीतला भवानी का अपना विशिष्ट महत्व है। कंचन काया की देवी मां शीतला को व्याधि, प्राकृतिक आपदा जनित रोग और संकट निवारक देवी के रूप में जन जन में लोकप्रियता प्राप्त है। पौराणिक मान्यता है कि शीतला माता, देवी पार्वती का ही रूप है। यद्यपि मां शीतला चेचक, त्वचा रोग ठीक करने वाली देवी मानी जाती है। यही कारण है कि इन्हें छोटी माता और बड़ी माता के रूप में भी अभिहित किया जाता है।स्कंदपुराण में वर्णित आख्यानों के अनुसार, भगवती शीतला की उत्पति जगत पिता ब्रह्म से हुई है। मां शीतला सात बहनें हैं, जिनके नाम शीतला,दुर्गा,काली,चंडी, पलमती,बड़ी माता (चमरीया) और भानुमती है। माता शीतला की सवारी गदर्भ (गधा) है।जिनके हाथों में मर्जनी ( झाड़ू ),कलश, सूप व नीम के पत्ते है। मां शीतला का रिश्ता स्वच्छता और साफ सफाई से जुड़ा हुआ है। मातृ कृपा का अचरज भरा संजोग इस घोर कलियुग में भी गांव से लेकर शहर तक व्याप्त है। ऐसे तो सालों भर भगवती शीतला की पूजा – अर्चना की जाती है, पर चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन भगवती शीतला भवानी के शीतला अष्टमी की धूम पूरे देश में बनी रहती है। मां शीतला भगवती दुर्गा की ही रूप है।यह अन्य पर्व त्योहारों से इस मायने में भिन्न है कि इसमें देवी को लगाए जाने वाले सभी भोग बासी होते हैं। अर्थात यह सभी भोग श्रद्धालुओं के यहां एक रात पहले ही बना दिए जाते हैं और दूसरे दिन सुबह किसी उपासक के घर का चुल्लाह नहीं जलता। इसलिए इसका एक नाम ” बासोड़ा ” भी है। पौराणिक मान्यता है कि ऊष्मा या गर्मी से त्वचा संबंधी रोग होते हैं।इसीलिए इस दिन बासी और ठंडी तासीर वाली चीजें खाई जाती हैं। शीतला माता को माता – पिता और जगधात्री भी कहा गया है।शीतले त्वं जगत माता, शीतले त्वं जगत पिता। शीतले त्वं जगधात्री, शीतलाय: नमो नमः।
