विद्यालयों में नामांकन रद्द किया जाना बच्चों के मौलिक अधिकार का हनन – डॉ अनिल
प्रवीण कुमार (कटिहार)
आर टी ई फोरम ने मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को लिखा पत्र ।
सरकारी विद्यालयों से बच्चों का नामांकन रद्द किये जाने पर राइट टू एजुकेशन फोरम ने कड़ा एतराज जताते हुए मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को पत्र लिखकर नामांकन रद्द करने संबंधी आदेश तत्काल वापस लेने की मांग की है। मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को लिखे पत्र में फोरम के प्रांतीय संयोजक डॉ अनिल कुमार राय कहा है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देश के सभी 6 से 14 आयुवर्ग के बच्चों का मौलिक संवैधानिक अधिकार है। बच्चों को पढ़ने का यह अधिकार जीवन के अधिकार का विस्तार करके प्रदान किया।गया है। अर्थात् इसे जीने के अधिकार के समान ही महत्वपूर्ण माना गया है। इस अधिनियम के नाम में ‘अनिवार्य’ शब्द यह इंगित करता है कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी बच्चे को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। सीएम ब सीएस को लिखे पत्र में उन्होंने यह भी कहा है कि बिहार के विद्यालयों में नामांकित क़रीब 25 लाख बच्चों का नामांकन रद्द कर उन्हें विद्यालय से बाहर कर दिया गया है। नामांकन रद्द किए जाने का आधार लगातार 15 दिनों तक विद्यालय से अनुपस्थित होना बनाया गया है। लेकिन नामांकन रद्द करने के पूर्व न तो कोई सूचना दी गयी और न ही कारण पूछा गया।यह न्याय के प्राकृतिक अधिकार का हनन है।नामांकन रद्द किए जाने का तर्क दिया गया है कि ये बच्चे दोहरा नामांकित है। इसी दोहरा नामांकन के कारण ये बच्चे विद्यालय नहीं आते है। लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व न तो कोई अध्ययन किया गया है और न ही इसका कोई सांख्यिकीय आधार है। यह केवल एक अवधारणा है और केवल अवधारणात्मक आधार पर करीब 25 लाख बच्चों को स्कूल से बाहर कर दिया गया है।पहले दोहरा नामांकित बच्चों की पहचान कर ली जानी चाहिए थी। राइट टू एजुकेशन फोरम ने मुख्यमंत्री से नामांकन रद्द करने के निर्देश को तत्काल प्रभाव से रद्द करने, निष्कासित बच्चों को बिना शर्त शत-प्रतिशत वापसी, अनामांकित बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करने तथा बजट का 25 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करने की है।बगैर अध्ययन के नामांकन रद्द करना अनुचित ।आरटीई फोरम के संयोजक पत्र में यह भी कहा है कि जैसा पहले भी होता रहा है और तब समीक्षोपरांत समुचित व्यवस्था होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं करके अनुपस्थिति को दोहरा नामांकन की अवधारणा से जोड़कर सरपट ढंग से नामांकन रद्द कर दिया गया है। नामांकन रद्द किए जाने के निर्देश के समय बिहार के सामाजिक परिप्रेक्ष्य को नजर में नहीं रखा गया है। बिहार के सरकारी विद्यालयों में आज जो बच्चे बच रहे है। वे सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अत्यंत वंचित समुदाय के ऐसे बच्चे हैं, जो अपनी पीढ़ियों में पहली बार स्कूल में दाखिल हुए है और जिनके अभिभावकों में अभी भी अपने बच्चों को पढ़ाने की तर्कसंगत परिस्थिति नहीं है। इसलिए बहुत ज़्यादा मुमकिन है कि दशकों के परिश्रम से जिन बच्चों को बड़ी मुश्किल से स्कूल में दाखिल कराया गया था। उनमें से बहुत सारे बच्चे अब फिर कभी स्कूल में वापस नहीं आये। इस तरह जिस सरकार का दायित्व सारे बच्चों को स्कूल में दाखिल कराना था।उसी के द्वारा स्कूल से बाहर किया जाना दायित्व के विपरीत व्यवहार है।शिक्षा प्राप्त करना बच्चों का मौलिक अधिकार ।
सीएम व सीएस को लिखे पत्र प्रांतीय संयोजक ने कहा है कि किसी भी परिस्थिति में अनिवार्य रूप से शिक्षा प्राप्त करना 6 से 14 आयुवर्ग के बच्चों का मौलिक संवैधानिक अधिकार है। इस अधिकार को किसी भी कारण से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है। पर नामांकन रद्द किए जाने के निर्देश से बच्चों के मौलिक संवैधानिक अधिकार का हनन होता है। यह गंभीर मामला है। अपर मुख्य सचिव के द्वारा दिनांक 02 नवंबर, 2023 को जिलाधिकारियों को भेजे गये पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि 10 प्रतिशत बच्चों का नाम काटकर डीबीटी के मद के 300 करोड़ बचाये जा सकते है। एसीएस के इस पत्र से यह जाहिर होता है कि पैसा बचाने के उद्देश्य से ही बच्चों का नाम काटकर उन्हें शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। यह किसी भी कल्याणकारी लोकतांत्रिक शासन में घोर आपत्तिजनक है।
