जोखिम भरे फैक्ट्रीयों, ईंट भट्ठे व होटलों में शिशकता बचपन
मनिहारी (रतन कुमार ओझा)
प्रति वर्ष बालश्रम निषेध दिवस के माध्यम से विश्व भर में बच्चों के श्रम शोषण के प्रति जागरूकता लाना है। अन्तराष्ट्रीय संगठनों के द्वारा 12 जून 2002 से बालश्रम निषेध दिवस मनाये जाने की नींव रखी गयी। तब से लेकर प्रति वर्ष 12 जून को सरकार, नियोक्ताओं, समाज व अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को बच्चों को खतरनाक व्यवसाय , कल-कारखानों व उनकी शारीरिक, मानसिक क्षमता के विरूद्ध कार्य के प्रति निषेध का आग्रह करती है।बालश्रम के विरुद्ध तमाम तरह की नियमों, उपबंधों के बावजूद जिले के सुदूरवर्ती गांवों में बच्चों से काम लिया जाता है। जबकि 6से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य मुफ्त शिक्षा दिये जाने का नियम है।बालश्रम में ढकेले बच्चों को बालश्रम से मुक्त कराकर जिले के विभिन्न भागों में बालश्रमिक विद्यालय और परियोजना समिति के माध्यम से पूर्व के वर्षों में संचालित थे।लेकिन कुछ वर्षों से इसके संचालन नहीं होने से बालश्रमिक बच्चों को समुचित शिक्षा नहीं मिलने से बच्चे अपने माता पिता के साथ मजदूरी में हाथ बटा रहे है ,तो कहीं भरण पोषण को मजदूरी करने को विवश है। होटलों, ईट भट्ठों, मोटर गैरेजों, आरामिलों, मे बच्चों से काम लेते सहज ही देखा जा सकता है।वैसे बच्चों से काम लेने से रोकने को लेकर धावादल भी क्रियाशील है। समय समय पर बच्चों से काम लेने वाले नियोक्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही भी की गयी है। बावजूद इसके बच्चों से काम लेने का चलन थमा नहीं है।बढ़ती आर्थिक तंगी, गरीबी, महंगाई की मार ने भी बच्चों को अपने माता पिता के साथ मजदूरी करने को विवश किया है।सामाजिक कार्यकर्ता व अभिलाषा परिवार के सचिव एवं राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना समिति, कटिहार के कार्यकारिणी सदस्य रहे राजेश कुमार सिंह एवं डा० मिथिलेश कुमार झा ने बालश्रम रोकने तथा बालश्रमिक को बालश्रम से मुक्त कराकर उनके परिवेश में ही पूर्व की भांति बालश्रमिक विधालय के संचालन की मांग की है।
