केवाला पंचायत के तेलडंगा स्थित आदिवासी टोला बाढ़ से टापू में तब्दील, प्रशासन की ओर से अब तक राहत सामग्री उपलब्ध नही
मनिहारी (रतन कुमार ओझा)
मनिहारी प्रखंड के केवाला पंचायत के तेलडंगा स्थित आदिवासी टोला बाढ़ के पानी से घिर कर टापू में तब्दील हो गया है। बढ़ते जलस्तर के कारण केवाला पंचायत के अधिकांश गांव मुख्यालय से पूरी तरह कट चुके हैं, जिनमें छोटी तेलडंगा और तेलडंगा प्रमुख है। ये आदिवासी बहुल गांव अब तक प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के ध्यान से अछूते हैं, जिससे वहां के निवासियों को राहत सामग्री तक पहुंचाने में भारी देरी हो रही है।छोटी तेलडंगा के निवासियों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय निवासी धरो मुर्मू, सविता सोरेन, और सुनीता मुर्मू जैसे लोग, 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुख्यालय से निजी नाव के सहारे अपने राशन की खरीद करने जा रहे हैं। विगत डेढ़ माह से ये लोग पानी के बीच इस कठिन यात्रा को मजबूरी में कर रहे हैं। सुनीता मुर्मू, जो मनिहारी हाई स्कूल की छात्रा है और मैट्रिक परीक्षा की प्री टेस्ट दे रही है, रोज़ाना जान जोखिम में डालकर नाव से स्कूल जा रही है।बड़ी तेलडंगा की लगभग 300 की आबादी इस संकट से जूझ रही है। वहां के निवासी संजय बासकी, शेखर सोरेन, और सीमन बास्की का कहना है कि पिछले चार वर्षों से उन्होंने अपने क्षेत्र के किसी जनप्रतिनिधि को नहीं देखा है। यहां तक कि इस कठिन समय में भी अंचल के किसी राजस्व कर्मचारी ने वहां का दौरा नहीं किया। गांव के लोग राशन की कमी और मवेशियों के लिए चारे की समस्या से जूझ रहे हैं। कई घरों के चूल्हे बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं, जिससे वहां के निवासियों की स्थिति और गंभीर हो गई है।पूर्व मुखिया मनोज मंडल और समिति सदस्य मुन्ना रजक ने प्रशासन से तुरंत सामुदायिक किचन की व्यवस्था, प्लास्टिक की चादरों का वितरण, और मवेशियों के लिए चारे की आपूर्ति की मांग की है। प्रशासनिक सुत्रों के अनुसार, मनिहारी प्रखंड के नौ पंचायतों के 32 वार्डों में करीब 30,000 की आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई है। धुरियाही, दिलारपुर, बाघमारा, उत्तरी कांटाकोस, दक्षिणी कांटाकोस, बघार, केवला और फतेहनगर पंचायत भी बाढ़ की चपेट में हैं। इन क्षेत्रों में 16 स्थानों पर सामुदायिक किचन शुरू करने की तैयारी चल रही है, लेकिन आदिवासी बहुल इलाकों में राहत कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाए हैं।आदिवासी क्षेत्र के “सुरक्षित” घोषित होने का फायदा यहां की आदिवासी जनता को नहीं मिल रहा है। सरकार का यह उद्देश्य था कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों का विकास हो, परंतु इस विपदा की घड़ी में वे लोग अब भी संघर्ष कर रहे हैं।
